महर्षि संतसेवी परमहंस जी
की एक आध्यात्मिक रचना प्रस्तुत है
. करो तुम साधना मन से , सफलता हाथ है तेरे । प्रस्तुति
प्रेमकुमार
संतमत परंपरा के चतुर्थ आध्यात्मिक गुरु और महर्षि
मेंहीं के प्रथम
अनुयायी महर्षि संतसेवी जी का स्थान
संतों की श्रेणी में
बहुत श्रेष्ठ कोटी का है ।उनका जन्म
20 दिसंबर1920 को
बिहार के एक छोटे –से गांव में
हुआ था । उनकी 94वीं
जयंती(2013)के अवसर पर उनकी
एक आध्यात्मिक रचना
प्रस्तुत की जा रही है .. करो तुम
साधना मन से , सफलता हाथ है तेरे । ...प्रस्तुति
प्रेमकुमार
करो तुम साधना मन से
, सफलता हाथ है तेरे ।
निश्छल भक्ति कर
गुरु की , सहायक
साथ है तेरे ।।
न छोड़ो जाप मानस को , न छोड़ो ध्यान मानस को।
अड़ा दो दृष्टि सुखमन
में ,तो काला विंदु है नेरे ।।
प्रथम काला दरसता है
,वही फिर श्वेत होता है ।
झलकता ज्योति जगमग
है, व मिटता तम का घेरा है।।
दृष्टि जब विंदु पर
जमती ,तो अनहद नाद है मिलता ।
नौबतें
पाँच टपने पर ,नहीं माया का घेरा है ।।
पंचम नौबत अकथ ध्वनि
ही ,परम प्रभु से मिलाती है।
‘संत‘ तहं भाव नहिं द्वैती, नहीं चौरासी
फेरा है ।।
20/12/2013


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