शनिवार, 18 अक्टूबर 2014

हनुमान चालीसा का भावार्थ




शनिवार के अवसर पर हनुमान चालीसा का भावार्थ

. श्री गुरु चरण सरोज रज निज मन मुकुरु सुधारी, बरनौ रघुवर बिमल जसु जो दायकु फल चारी

श्री गुरू महाराज जी के चरण कमलों की धूली से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके श्री रघुवीर के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ| जो चारों फ़ल: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देने वाला है|

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार । बल बुद्धिविद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार ॥

हे पवनकुमार! मैं अपने को शरीर और बुद्धि से हीं जान कर आपका ध्यान कर रहा हूँ| आप मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि एंव विध्या देकर मेरे दु:खों व दोषों का नाश करने की कृपा कीजिए|

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर । जै कपीस तिहुँलोक उजागर ॥

ज्ञान और गुणों के सागर श्री हनुमान जी की जय हो| आपका ज्ञान और गुण अथाह है| हे कपीश्वर! आपकी जय हो| तीनो लोकों (स्वर्ग लोक, भू लोक और पाताल लोक) में आपकी कीर्ति है|

रामदूत अतुलित बलधामा । अंजनि-पुत्र पवन-सुत नामा ॥

हे पवनसुत अंजनीपुत्र श्री राम दूत हनुमान जी, आप अतुलित बल के भंडारघर हैं|

महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥

हे महावीर बजरंग बली! आप अनन्त पराकर्मी हैं| आप दुर्बुद्धि को दूर करते हैं तथा सद्बुद्धि वालों के साथी हैं|

कंचन बरण बिराज सुबेशा । कानन कुंडल कुंचित केशा ॥

आपकी स्वर्ण के समान अंग पर सुन्दर वस्त्र, कानों में कुंडल और घुँघराले बाल सुशोभित हो रहे हैं |

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै । काँधे मूँज जनेऊ साजै ॥

आपके हाथ में वज्र और ध्वजा विराजमान है तथा कंधों पर मूंश क़ा जनेऊ सुशोभित है |

शंकर-सुवन केशरी-नन्दन । तेज प्रताप महा जग-वंदन ॥

आप भगवान शंकर के अवतार और केसरी नंदन के नाम से प्रसिद्ध हैं| आप अति तेजस्वी प्रतापी तथा सारे संसार के वन्दनीय हैं|

विद्यावान गुणी अति चातुर । राम काज करिबे को आतुर ॥

आप समस्त विधयाओं से परिपूर्ण हैं| आप गुणवान और अत्यंत चतुर हैं| आप श्रीराम क़ा कार्य करने के लिए लालाइत रहते हैं|

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लषन सीता मन बसिया॥

आप श्रीराम कथा सुनने के प्रेमी हैं और आप श्रीराम, श्रीसीताजी और श्रीलक्ष्मण के ह्रदय में बसते हैं॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा॥

आप सूक्ष्म रूप में श्रीसीताजी के दर्शन करते हैं, भयंकर रूप लेकर लंका का दहन करते हैं

भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥

आपने संजीवनी बूटी लाकर श्रीलक्ष्मण की प्राण रक्षा की, श्रीराम आपको हर्ष से हृदय से लगाते हैं।

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

राम आपकी बहुत प्रशंसा करते हैं और आपको श्रीभरत के समान अपना प्रिय भाई मानते हैं॥

सहस बदन तुम्हरो जस गावै। अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥

आपका यश हजार मुखों से गाने योग्य है, ऐसा कहकर श्रीराम आपको गले से लगाते हैं।

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥

सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देव और मुनि, नारद, सरस्वती जी और शेष जी

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोविद कहि सके कहाँ ते॥

यम, कुबेर आदि दिग्पाल भी आपके यश का वर्णन नहीं कर सकते हैं, फिर कवि और विद्वान कैसे उसका वर्णन कर सकते हैं।

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राजपद दीन्हा॥

आपने सुग्रीव का उपकार करते हुए उनको श्रीराम से मिलवाया जिससे उनको राज्य प्राप्त हुआ॥

तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

आपकी युक्ति विभीषण माना और उसने लंका का राज्य प्राप्त किया, यह सब संसार जानता है।

जुग सहस्त्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

आप सहस्त्र योजन दूर स्थित सूर्य को मीठा फल समझ कर खा लेते हैं॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गए अचरज नाहीं॥

प्रभु श्रीराम की अंगूठी को मुख में रखकर आपने समुद्र को लाँघ लिया, आपके लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

इस संसार के सारे कठिन कार्य आपकी कृपा से आसान हो जाते हैं॥

राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे

श्रीराम तक पहुँचने के द्वार की आप सुरक्षा करते हैं, आपके आदेश के बिना वहाँ प्रवेश नहीं होता है|

सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डरना॥

आपकी शरण में सब सुख सुलभ हैं, जब आप रक्षक हैं तब किससे डरने की जरुरत है॥

आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥

अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं, तीनों लोक आपकी ललकार से काँपते हैं।

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥

केवल आपका नाम सुनकर ही भूत और पिशाच पास नहीं आते हैं॥

नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

महावीर श्री हनुमान जी का निरंतर नाम जप करने से रोगों का नाश होता है और वे सारी पीड़ा को नष्ट कर देते हैं।

संकट तें हनुमान छुडावैं। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥

जो श्री हनुमान जी का मन, कर्म और वचन से स्मरण करता है, वे उसकी सभी संकटों से रक्षा करते हैं॥

सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥

सबसे पर, श्रीराम तपस्वी राजा हैं, आप उनके सभी कार्य बना देते हैं।

और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै॥

उनसे कोई भी इच्छा रखने वाले, सभी लोग अनंत जीवन का फल प्राप्त करते हैं॥.

चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥

आपका प्रताप चारों युगों में विद्यमान रहता है, आपका प्रकाश सारे जगत में प्रसिद्ध है।

साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥

आप साधु- संतों की रक्षा करने वाले, असुरों का विनाश करने वाले और श्रीराम के प्रिय हैं॥

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥

आप आठ सिद्धि और नौ निधियों के देने वाले हैं, आपको ऐसा वरदान माता सीताजी ने दिया है।

राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥

आपके पास श्रीराम नाम का रसायन है, आप सदा श्रीराम के सेवक बने रहें॥

तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥

आपके स्मरण से जन्म- जन्मान्तर के दुःख भूल कर भक्त श्रीराम को प्राप्त करता है |

अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि – भक्त कहाई॥

अंतिम समय में श्रीराम धाम (वैकुण्ठ) में जाता है और वहाँ जन्म लेकर हरि का भक्त कहलाता है|

और देवता चित न धरई। हनुमत से हि सर्व सुख करई॥

दूसरे देवताओं को मन में न रखते हुए, श्री हनुमान से ही सभी सुखों की प्राप्ति हो जाती है।

संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

जो महावीर श्रीहनुमान जी का नाम स्मरण करता है, उसके संकटों का नाश हो जाता है और सारी पीड़ा ख़त्म हो जाती है॥

जै जै जै हनुमान गोसाई। कृपा करहु गुरुदेव की नाई॥

भक्तों की रक्षा करने वाले श्री हनुमान की जय हो, जय हो, जय हो, आप मुझ पर गुरु की तरह कृपा करें।

सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥

जो कोई इसका सौ बार पाठ करता है वह जन्म-मृत्यु के बंधन से छूटकर महासुख को प्राप्त करता है|

जो यह पढ़ै हनुमान चलीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

जो इस श्री हनुमान चालीसा को पढ़ता है उसको सिद्धि प्राप्त होती है, इसके साक्षी भगवान शंकर है ।

तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ ह्रदय महँ डेरा॥

श्री तुलसीदास जी कहते हैं, मैं सदा श्रीराम का सेवक हूँ, हे स्वामी! आप मेरे हृदय में निवास कीजिये॥

पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप। राम लषन सीता सहित ह्रदय बसहु सुर भूप॥


वनपुत्र, संकटमोचन, मंगलमूर्ति श्री हनुमान आप देवताओं के ईश्वर श्रीराम, श्रीसीता जी और श्रीलक्ष्मण के साथ मेरे हृदय में निवास कीजिये॥

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

आदिशक्ति मां दुर्गा की कथा.

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.,, आदिशक्ति मां दुर्गा ...
दुर्गा अवतार की कथा है कि असुरों द्वारा संत्रस्त देवताओं का उद्धार करने के लिए प्रजापति ने उनका तेज एकत्रित किया था
 और उसे काली का रूप देकर प्रचण्ड शक्ति उत्पन्न की थी. दुर्गा सप्तशती के सर्ग 10/18 में अनुसार संपूर्ण देवताओं के तेज में
 महिषासुरमर्दिनी दुर्गा का जन्म हुआ. भगवान शंकर के तेज से देवी का मुख प्रकट हुआ, यमराज के तेज से उनके सिर में बाल निकल आए.
विष्णु भगवान के तेज से उनकी भुजाएँ उत्पन्न हुईं. चन्द्रमा के तेज से दोनों स्तनों का और इन्द्र के तेज से कटिप्रदेश का प्रादुर्भाव हुआ.
 वरुण के तेज से जंघा और पिंडली तथा पृथ्वी के तेज से नितंबभाग प्रकट हुआ. ब्रह्मा के तेज से दोनों चरण और सूर्य के तेज से
उनकी उँगलियाँ प्रकट हुईं. वसुओं के तेज से हाथों की उँगलियाँ और कुबेर के तेज से नासिका प्रकट हुई. उस देवी के दाँत प्रजापति के तेज
 से और तीनों नेत्र अग्नि के तेज से प्रकट हुए. उनकी भौंहें संध्या के और कान वायु के तेज से उत्पन्न हुए थे. इसी प्रकार अन्यान्य
 देवताओं के तेज से भी उस कल्याणमयी देवी का आविर्भाव हुआ. प्रकट हुई दुर्गाशक्ति को समर्थ और शक्तिशाली करने के लिए
सभी देवताओं ने अपनी विशिष्टता, प्रतिभा का सामूहिक दान किया.
सभी शक्तियों और देवताओं के तेज से उत्पन्न उस चण्डी ने अपने पराक्रम से असुरों को समूल नाश किया और देवताओं को
उनका उचित स्थान दिलाया था . इस कथा का आशय यही है कि सामूहिकता की शक्ति असीम है. इसका जिस भी प्रयोजन में
उपयोग किया जाएगा, उसी में असाधारण सफलता मिलती चली जाएगी. दुर्गा का वाहन सिंह है. वह पराक्रम का प्रतीक है. दुर्गा की
 संघर्ष की देवी हैजीवन संग्राम में विजय प्राप्त करने के लिए हर किसी को आंतरिक दुर्बलताओं और स्वभावगत दुष्प्रवृत्तियों से
 निरंतर जूझना पड़ता है. बाह्य जीवन में अवांछनीयताओं एवं अनीतियों के आक्रमण होते रहते हैं और अवरोध सामने खड़े रहते हैं.
उनसे संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है. शांति से रहना तो सभी चाहते हैं, पर आक्रमण और अवरोधों से बच निकलना कठिन है .
 उससे संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं. ऐसे साहस का, शौर्य-पराक्रम का उद्भव गायत्री महाशक्ति के अंतगर्त दुर्गा तत्त्व के
उभरने पर संभव होता है. गायत्री उपासना से साधक के अंतराल में उसी स्तर की प्रखरता उभरती है. इसे दुर्गा का अनुग्रह साधक को उपलब्ध हुआ माना जाता है.
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. .,, आदिशक्ति मां दुर्गा ...

आदिशक्ति मां दुर्गा ......,                                                                      
      आदिशक्ति मां दुर्गा                                
 आदिशक्ति मां दुर्गा ...
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नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नम:। नम: प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणता: स्म ताम्॥1
रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धा˜यै नमो नम:। ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नम:॥2

कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नम:। नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नम:॥3
दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै। ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नम:॥4

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नम:। नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नम:॥5
या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥6

या देवी सर्वभेतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥7
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥8

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥9
या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥10

या देवी सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥11
या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥12

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥13
या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥14

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥15
या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥16

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥17
यादेवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥18

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥19
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥20

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥21
या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥22

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥23
या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥24

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥25
या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥26

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या। भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नम:॥ 27
चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद्व्याप्य स्थिता जगत्। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥28

स्तुता सुरै: पूर्वमभीष्टसंश्रयात्तथा सुरेन्द्रेण दिनेषु सेविता।
करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापद:॥29
या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै-रस्माभिरीशा च सुरैर्नमस्यते।
या च स्मृता तत्क्षणमेव हन्ति न: सर्वापदो भक्ति विनम्रमूर्तिभि:॥30



अहोई अष्टमी

अहोई अष्टमी : हिन्दू महिलाओं  द्वारा उत्तर भारत  में संतान के  दीर्घायु  के लिए की जाने वाली  पूजा

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण है। माताएं अहोई अष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय होई का पूजन किया जाता है। तारों को अर्घ्य भी दिया जाता है। यह होई गेरु आदि के द्वारा दीवाल पर बनाई जाती है अथवा किसी मोटे वस्त्र पर होई काढकर पूजा के समय उसे दीवाल पर टांग दिया जाता है।.]
होई के चित्रांकन में ज्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास साही तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं। करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद अष्टमी तिथि को देवी अहोई माता का व्रत किया जाता है। यह व्रत पुत्र की लम्बी आयु और सुखमय जीवन की कामना से पुत्रवती महिलाएं करती हैं।].
उत्तर भारत के विभिन्न अंचलों में अहोईमाता का स्वरूप वहां की स्थानीय परंपरा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की होई बनवाती हैं। . कलश की स्थापना होती है। अहोईमाता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। अनहोनी को होनी बनाने वाली माता देवी पार्वती हैं इसलिए माता पर्वती की पूजा की जाती है  और संतान की लंबी आयु की कामनाकी जाती है ।
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श्री राम स्तुति



श्री राम स्तुति



श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम्।

नवकंज लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद-कंजारुणम्॥

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कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील-नीरद सुन्दरम्।

पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरम्॥

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भजु दीनबंधु दिनेश दानव, दैत्य-वंश-निकन्दनम्।

रघुनंद आनंदकंद कौशलचंद दशरथ-नंदनम्॥

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सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणम्।

आजानुभुज शर चाप धर, संग्रामजित खरदूषणम्॥

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इति वदति तुलसीदास शंकर, शेष-मुनि-मन-रंजनम्।

मम हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल दल गंजनम्॥

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मनु जाहिं राचेहु मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सांवरो।

करुणा निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो॥

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एहि भांति गौरि असीस सुनि सिय सहित हिय हरषी अली।

तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

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सोरठा: जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥

॥ सियावर रामचन्द्र की जय ॥
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