बुधवार, 11 दिसंबर 2013

तुलसीदास : गीतावली : बैठी सगुन मनावति माता।…











कौशल्या बैठी शकुन मनाती है । काग से पूछती है –तुम सच बोलो और मुझे बताओ की मेरे प्राणों से प्यारे वे लोग कब आएंगे ?काग को लालच भी देती है कि उसे दोने में दूध पीने को देगी और उसके चोंच को सोने से मढ़वा देगी ।फिर उसे यह भान होने लगता है कि राम-वन –गमन की अवधि अब समाप्त होने को है इसलिए वह ज्योतिष भी बुलवा लेती है कि वह जान ले कि वह कौन –सी घड़ी होगी जब उसके नयन जुड़ा जाएंगे । तभी उसे उनके लौटने कि सूचना मिलती है ।


इस सूचना से कौशल्या  की वही दशा होती है जैसे जल-विहीन मीन को पुन: जल मिल गया हो ...प्राण पुन: जीवित हो गया हो ।... तुलसीदास की  गीतावली : बैठी सगुन मनावति माता।
बैठी सगुन मनावति माता।
कब ऐहैं मेरे बाल कुशल घर ,कहहु ,काग !फुरी बाता ।।
दूध भात की दोनों दैहों , सोने चोंच      मढ़ैहौं  ।
जब सिय- सहित बिलोकि नयन भरि राम –लषण उर लैहौं।।
अवधि समीप जानि जननी जिय    अति आतुर अकुलानी ।
गनक बोलाइ, पांय परि पुछति प्रेम मगन    मृदु  बानी ।।
तेहि अवसर कोउ भरत निकटते समाचार   लै      आयो ।
प्रभु –आगमन सुनत तुलसि मनो मीन  मरत जल पायो ।।




10/12/2013

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