महर्षि
मेंहीं-पदावली :(4-अंतिम)
भगवान श्री कृष्ण ने
अर्जुन को आत्मा के संबंध में जो उपदेश दिए , आत्मा को जानने-समझने के लिए महर्षि मेंहीं
ने इस पदावली में इस
गूढ़ विषय को किस प्रकार हमारे समक्ष रखा है ... देखें पदावली के अंतिम अंश... प्रस्तुति प्रेमकुमार ...
(4-अंतिम)
भरो व्योम से घट फिरै
व्योम में जस।
भरो सव तासों फिरै ताहि
में तस।।
नहीं आदि अवसान
नहिं मध्य जाको ।
नहीं ठौर कोऊ
रखै
पूर्ण वाको ।।
सभी के परे
जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है
सोई आत्मा है।।
हैं घट मठ पटाकाश कहते बहुत-सा ।
न टूटे रहै एक तो अकाशा।।
है तस ही अमित चर अचर
हू को आतम ।
कहैं बहु न टूटै न होवै सो बहु कम।।
सभी के परे
जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है
सोई आत्मा है।।
न था काल जब था वरतमान जोई ।
नहीं काल ऐसो रहेगा न ओई ।।
मिटैगा अवस काल वह न
मिटैगा ।
है सतगुरु जो पाया वही यह
बुझेगा ।।
सभी के परे
जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है
सोई आत्मा है।।
सरव श्रेष्ठ तनधर की
भी बुधि न गहती ।
जो ऐसो अगम संतवाणी ये कहती
।।
करै पूरा वर्णन तिसे
‘मेंहिं’ कैसे ।
है कंकर –वणिक कहै मणि-गुण को जैसे ।।
सभी के परे जो
परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है
सोई आत्मा है।।
05/12/2013


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें