बुधवार, 4 दिसंबर 2013

महर्षि मेंहीं-पदावली :(4-अंतिम) : सभी के परे जो परम तत्त्व रूपी ...सोई आत्मा है सोई आत्मा है...प्रस्तुति प्रेमकुमार

महर्षि मेंहीं-पदावली  :(4-अंतिम) 

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा के संबंध में जो उपदेश दिए , आत्मा को जानने-समझने के लिए महर्षि मेंहीं
ने इस पदावली में इस गूढ़ विषय को किस प्रकार हमारे समक्ष रखा है ... देखें पदावली के अंतिम अंश... प्रस्तुति प्रेमकुमार ...

 (4-अंतिम)

भरो व्योम से घट फिरै व्योम में    जस।
भरो सव तासों फिरै     ताहि में  तस।।
नहीं  आदि  अवसान नहिं मध्य  जाको ।
नहीं  ठौर कोऊ  रखै  पूर्ण      वाको ।।
सभी के  परे       जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है          सोई आत्मा है।।

हैं घट मठ  पटाकाश   कहते  बहुत-सा ।
टूटे रहै    एक  तो        अकाशा।।
है तस ही अमित चर अचर हू को आतम ।
हैं बहु न टूटै न होवै सो बहु     कम।।
सभी के  परे       जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है          सोई आत्मा है।।
न था काल जब      था वरतमान जोई ।
नहीं काल ऐसो       रहेगा  न    ओई ।।
मिटैगा अवस काल    वह   न  मिटैगा ।
है सतगुरु जो पाया    वही  यह बुझेगा ।।
सभी के  परे       जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है          सोई आत्मा है।।

सरव श्रेष्ठ तनधर की भी बुधि   न गहती ।
जो ऐसो   अगम संतवाणी   ये   कहती ।।
करै पूरा वर्णन तिसे  मेंहिं       कैसे ।
है कंकर –वणिक  कहै मणि-गुण को जैसे ।।
सभी के  परे        जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है           सोई आत्मा है।।




05/12/2013

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