गुरुवार, 28 नवंबर 2013

हज़रत निजामुद्दीन-सूफी संत की एक रचना ...परबत बाँस मंगाव मेरे बाबुल !...प्रस्तुति प्रेमकुमार

 हज़रत निजामुद्दीन-सूफी संत की एक रचना ...परबत बाँस मंगाव मेरे बाबुल !...प्रस्तुति प्रेमकुमार

सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया वैराग्य और हनशीलता के प्रतीक थे ।सूफी काव्य की धारा आध्यात्मिक प्रेम की धारा है । यह प्रेम और भक्ति के माध्यम से सत्य की ओर ले जाती है ।...देखें ... हज़रत निजामुद्दीन की यह
रचना... परबत बाँस मंगाव मेरे बाबुल ! ....  प्रस्तुति प्रेमकुमार


परबत बाँस मंगाव मेरे बाबुल ! नीके मड़वा छाव रे !
सोना दीन्हा ,रूपा दीन्हा , बाबुल दिल-दरयाव    रे !
हाथी दीन्हा  ,घोड़ा दीन्हा , बहुत – बहुत मन चाव रे!
डोलिया फंदाय पिया लै चलिहै, अब नहिं कोई  आव रे!
गुड़िया खेलन  माँ के घर रह गयी , नहिं खेलन को दाव रे !
निजामुद्दीन औलिया बहियां पकरि धरिहौं वाके पांव   रे !


27/11/2013
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बुधवार, 27 नवंबर 2013

महर्षि मेंहीं-पदावली : सभी के परे जो परम तत्त्व रूपी ...सोई आत्मा है सोई आत्मा है...प्रस्तुति प्रेमकुमार ...



महर्षि मेंहीं-पदावली : सभी के परे जो परम तत्त्व रूपी ...सोई आत्मा है सोई आत्मा है...प्रस्तुति प्रेमकुमार ...

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा के संबंध में जो उपदेश दिए , आत्मा को जानने-समझने के लिए महर्षि मेंहीं
ने इस पदावली में इस गूढ़ विषय को किस प्रकार हमारे समक्ष रखा है ... देखें पदावली के कुछ अंश... प्रस्तुति प्रेमकुमार ...

नहीं थल नहीं जल नहीं वायु अग्नी।
नहीं व्योम ना पाँच तन्मात्र   ठगनी ।।
ये त्रय गुण नहीं नाहिं इन्द्रिन चतुर्दश ।
नहिं मूल प्रकृति जो अव्यक्त आगम अस ।।
सभी के परे जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है सोई आत्मा है   ।।

न उद्भित स्वरूपी न उष्मज स्वरूपी।
न अण्डज स्वरूपी न पिण्डज स्वरूपी ।।
नहीं विश्व रूपी न विष्णु  स्वरूपी ।
न शंकर स्वरूपी न ब्रह्मा स्वरूपी ।।
सभी के परे जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है सोई आत्मा है   ।।

जो मारे मरै ना जो काटे कटे ना ।
जो साडै ना जो जारे जरे   ना ।।
जो सोखा ना जाता सोखे से कछु भी ।
नहीं टारा जाता टारे से  कछु  भी ।।
सभी के परे जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है सोई आत्मा है   ।।

नहीं जन्म जाको नहीं मृत्यु जाको ।
नहीं  बाल यौवन ज्ररापन है जाको ।।
जिसे नाहिं होती अवस्था हु चारो ।
नहिं कुछ कहाता जो वर्णहू  चारो ।।
सभी के परे जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है सोई आत्मा है   ।।
                          (क्रमश:)


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सोमवार, 25 नवंबर 2013

तुलसीदास : राजन ! राम –लखन जो दीजै। [Tulsidas: Ram-Lakhan jo dijai ]



तुलसीदास : राजन ! राम –लखन जो दीजै।
[Tulsidas: Ram-Lakhan jo dijai ]

राजा दरथ के पास मुनि विश्वामित्र पधारे हैं । राजा से मुनि
दोनों पुत्रों को ले जाने की मांग कर रहें हैं । आश्रम के आस-पास दानवों का उपद्रव बढ़ता जा रहा है जो मुनियों की तपस्या में विघ्न दल रहे हैं । मुनि जानते हैं कि दानवों का नाश राम और लक्ष्मण द्वारा ही होगा । पर राजा भयभीत हैं कि मेरे ये प्राणों से अधिक प्यारे सुकुमार बालक दानवों से मुनि कि रक्षा भला किस प्रकार करेंगे ? विश्वामित्र जी उन्हें
समझाते हैं कि आप अपने पुत्रों के विषय में वामदेव और अपने कुल-गुरु वशिष्ठ जी से पूछिये ! आप स्वयं भी बड़े कुशल हैं । इनको साथ ले जाने में इनका भी लाभ है ...
रघुवंश की कीर्ति इनसे ही उजागर होगी ...मुनियों की
तपस्या भी सफल होगी ...देखें तुलसीदास जी का यह पद तुलसीदास : राजन ! राम –लखन जो दीजै। ...प्रस्तुति प्रेमकुमार

राजन ! राम –लखन जो दीजै।
जस रावरो , लाभ ढोटनिहूँ ,
मुनि   सनाथ   सब कीजै  ।
डरपत हौ साँचे सनेह   बस ,
सुत-प्रभाव      बिनु   जाने ।
बूझिय बामदेव अरु   कुलगुरु,
तुम पुनि       परम सयाने।।

रिपु रन दलि,  मख     राखि,
कुसल अति अलप दिननि घर ऐहैं।
तुलसिदास       रघुबंसतिलककी
कबिकुल          कीरति    गैहैं ।।

रविवार, 24 नवंबर 2013

सूरदास : होत सो, जो रघुनाथ ठटै .. [Surdas : hot so ,jo Raghunath thtai …]

सूरदास : होत सो, जो रघुनाथ ठटै ...प्रस्तुति प्रेमकुमार

  [Surdas : hot so ,jo Raghunath thtai …]

रघुनाथ जी ने जो विधान रच दिया है , जीवन की घटनाएँ उसी के अनुरूप घटेगीं । ध्यान , योग , साधना ,तप यदि विधान को बदलने के उद्देश्य से किया जाय तो सार्थक साबित नहीं होगा । वेद –पुराण का पाठ यदि होनी को टालने के नियत से किया जाय तो वह भी कारगर नहीं होगा । कर्म –बंधन भगवत-भजन जैसे अस्त्र से कट सकता है । ...देखें सूरदास जी का यह पद ... होत सो, जो रघुनाथ ठटै ...प्रस्तुति प्रेमकुमार


होत सो, जो रघुनाथ ठटै ।
पचि-पचि रहैं सिद्ध ,साधक ,मुनि,
तऊ      न          बढै-टै।।
जोगी जोग धरत मन अपनै ,
सिर पर     राखि    जटै ।
ध्यान धरत महादेव अरु ब्रह्मा,
तिनहुं      पै      न  छटै ।।
जती, सती , तापस आराधै ,
चारों वेद              रटै ।
सूरदास भगवंत –भजन बिनु,
काम-फांस        न  कटै ।।









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शनिवार, 23 नवंबर 2013

सूरदास ...हरि सौं मीत न देख्यो कोई.


  सूरदास –पदावली ...हरि सौं मीत न देख्यो कोई... 



प्रभु जैसा कोई मित्र हो नहीं सकता । अपने भक्तों की मदद के लिए श्री हरि सर्वदा तत्पर रहते हैं । ग्राह से गजराज की रक्षा की ,लाक्षागृह में प्रभु की युक्ति से पांडवों की जान बची ,दुर्वासा के शाप से राजा अंबरीष को मुक्ति दिलायी । जिन भक्तों को प्रभु में अटल विश्वास है , उनके संकटों के निवारण की चिंता स्वयं परमात्मा करते हैं ।,,,देखें ... सूरदास जी का यह पद ....हरि सौं मीत न देख्यो कोई... प्रस्तुति ... प्रेमकुमार


हरि सौं मीत न देख्यो कोई ।
बिपति-काल सुमिरत ,तिहिं औसर आनि  तिरीछो होई ।।
ग्राह गहे  गजपति मुकरायौ , हाथ चक्र लै धायो ।
तजि बैकुंठ, गरुड़ तजि , निकट दास कै  आयो ।।
दुर्बासा कौ साप निवारयौ ,अंबरीष-पति   राखी ।
ब्रह्मलोक –परजंत फिरयौ तहं   देव –मुनि-जन साखी।।
लाखागृह तै जरत  पांडु-सुत बुधि-बल नाथ उबारे ।
सूरदास-प्रभु  अपने जनके  नाना त्रास  निवारे ।।