सूफी संत हज़रत
निजामुद्दीन औलिया वैराग्य और सहनशीलता के प्रतीक थे ।सूफी काव्य की धारा
आध्यात्मिक प्रेम की धारा है । यह प्रेम और भक्ति के माध्यम से सत्य की ओर ले जाती
है ।...देखें ... हज़रत निजामुद्दीन की
यह
रचना... परबत बाँस मंगाव मेरे बाबुल ! .... प्रस्तुति
प्रेमकुमार
परबत बाँस मंगाव मेरे बाबुल ! नीके मड़वा छाव रे !
सोना दीन्हा ,रूपा दीन्हा , बाबुल दिल-दरयाव
रे !
हाथी दीन्हा ,घोड़ा दीन्हा , बहुत –
बहुत मन चाव रे!
डोलिया फंदाय पिया
लै चलिहै, अब नहिं कोई आव रे!
गुड़िया खेलन माँ के घर रह गयी , नहिं खेलन को दाव रे !
‘निजामुद्दीन औलिया’ बहियां पकरि धरिहौं वाके पांव रे !
27/11/2013
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