गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013

विद्यापति : ( शिव वर के रूप में ) : :सखी हे सुनै छलिएन



शिव को वर के रूप में देख कर पार्वती  की एक सखी  अपनी प्रतिक्रिया
किस प्रकार व्यक्त करती है ....देखें मैथिली के कवि विद्यापति के शब्दों में... प्रस्तुति प्रेमकुमार

शिव वर के रूप में ...

सखी हे सुनै छलिएन
शिव बड़ सुन्दर,
मुदा देखै छिएन
रूप भयंकर हे ।
सखी हे सुनै छलिएन
शिव औता गज चढ़ि हे ,
मुदा शिव ऐला बड़द चढ़ि हे ।
सखी हे सुनै छलिएन
शिव के पिताम्बर हे,
मुदा देखै छिएन
ओढ़ने बाघम्बर हे ।
भनहि विद्यापति गावल ,
शिव सुंदर वर गौरी पावल

 pkjayaswal@gmail.com

विद्यापति : (शिव : वर के रूपमें ) ::हम नहिं आजु रहब एहि आँगन ,

मेरे  भक्ति-साहित्य  के संकलन से... प्रेमकुमार

भक्ति-–साहित्य के अनमोल  धरोहर से  कुछ मोती पाठकों  के समक्ष पेश करने की उत्कट अभिलाषा से प्रेरित है -यह प्रयास...
शिव को वर के रूप में देख कर माता की कैसी तीव्र प्रतिक्रिया
होती है ...ज्वालामुखी की भांति माँ का क्रोध किस प्रकार फूट पड़ता है
...देखें मैथिली के कवि विद्यापति के शब्दों में... प्रस्तुति प्रेमकुमार

हम नहिं आजु रहब एहि आँगन ,
जओं  बुढ़   होएत     जमाए ।
एक तं बैरी भेल बिधी बिधाता ,
दोसर धिया  केर      बाप ।
तेसर बैरी भेल नारद बाभन,
जे  बुढ़   आनल      जमाए ।
पहिलुक बाजन डमरू तोरब ,
दोसरे  तोड़ब    रुण्डमाल ।
बड़द हाँकि बरिआत बैलाएब ,
धिया ल जाएब पड़ा ।
धोती लोटा पतड़ा पोथी ,
सेहो सब लेबिन्ह छिनाए ।
जों कुछ बजता नारद बाभन,
दाढ़ी धए  घिसिआयब  ।
भनहि विद्यापति सुनु हे मनाइनि,
दिढ़ करू अपन गेआन ।
सुभ सुभ  धिआ बिआहिब,
गौरी-हर एक समान ।
(pkjayaswal@gmail.com)


मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

विद्यापति :(शिव को वर के रूप में): जोगिया एक हम देखल गे माई


जोगिया एक हम देखल गे माई

शिव को वर के रूप में देख कर एक बाला अपनी प्रतिक्रिया
माँ से जाहिर करती है ...देखें मैथिली के कवि विद्यापति के
शब्दों में... प्रस्तुति प्रेमकुमार

जोगिया एक हम देखल गे माई ।
अढ्भुत रूप,कहल नहिं जाई ।
पाँच वादन,तीन नयन विशाला ।
वसन विहून ओढ़न बघछाला ।
सिर वह गंग,तिलक सोहू चंदा ।
देखि सरूप  मेटल  दुख –दन्दा ।
एही जोगियामे रतली भवानी ।
मन आनल पर कौन गुन जानी ।
कुल नहीं सिल, नहिं तात महतारी।
वएस हिनक थिक लक्ष जुग चारी ।
सुनु ए मनाइनि विद्यापति वाणी ।

एहो जोगीआ थिका त्रिभुवन दानी ।
pkjayaswal11@gmail.com

सूरदास :( वियोग में व्यथित कृष्ण की गोपियाँ..).निशि दिन बरसत नैन हमारे।..

वियोग में व्यथित कृष्ण की
गोपियाँ...

कृष्ण के वियोग में गोपियों की क्या अवस्था हो गयी है...यह बताती हैं
गोपियाँ –उद्धव को ...प्रस्तुति : प्रेमकुमार (कवि-सूरदास)


निशि दिन बरसत नैन हमारे।
सदा रहत पावस ऋतु हम पर
जबतें श्याम सिधारे ।

अंजन थिर न रहत अंखियन में
कर कपोल भय कारे।
कंचुकि-पट सुखत नहीं कबहूँ,
उर बिच बहत पनारे ।
आँसू सलिल भये पग थाके,
बहे जात-सीत-तारे ।
सूरदास अब ड़ूबत है ब्रज,
काहे न लेत उबारे ।
(सूरदास)

pkjayaswal11@gmail.com

श्री रामचरितमानस से :( जानकी का गौरी-पूजन): जय जय गिरिबरराज किशोरी।


 जानकी का गौरी-पूजन

रामचरित मानस से...प्रसंग है जानकी का गौरी-पूजन...भवानी के मंदिर में सीता की वंदना...तुलसीदास जी के शब्दों में...

जय जय गिरिबरराज किशोरी।
जय महेस मुख चंद  चकोरी ।।,
जय गजबदन सडानन माता ।
जगत जननि दामिनी दुति गाता ।।
नहिं तब आदि मध्य अवसाना ।
अमित प्रभाउ बेदु नहीं जाना ।।
भव भव विभव पराभव कारिनि ।
बिस्व बिमोहिनी स्वबस बिहारिनी ।।

मोर  मनोरथ   जानहु     निकें  ।
बसहु सदा उर पुर सबही     कें  ।।

कीन्हेऊँ प्रगट न कारन तेहीं ।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं  ।।
बिनय प्रेम  बस भई भवानी ।
खसी माल मूरति मुस्कानी ।।
सादर सिंय प्रसादु सिर धरेउ ।
बोली गौरि हरषु हिय भरेऊ । ।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी ।
पूजिहि मन कामना  तुम्हारी ।।
एहि भांति गौरि असीस सुनि
सिय सहित हिय हरषी अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि
मुदित मन मंदिर चली ।


)pkjayaswal11@gmail.com










रविवार, 20 अक्टूबर 2013

विद्यापति : कखन हरब दु:ख मोर हे भोलानाथ !...

मेरे प्रिय भजन: हे भोलानाथ !मैथिली में...  

कखन हरब दु:मोर
हे भोलानाथ !

दु:खहि जनम भेल,
दु:हि गमाओल,
सुख सपनहु नहिं भेल ।

एहि भवसागर थाह कतहु नहिं
भैरव धरु करूआर ।
भनहि विद्यापति मोर भोलानाथ
गति करब अन्त मोही पार ।

(विद्यापति रचित)pkjayaswal11@gmail.com