बुधवार, 11 दिसंबर 2013

मीरा के पद... मन रे पासि हरि के चरन।..


मीरा के पद... मन रे पासि हरि के चरन।... प्रस्तुति प्रेमकुमार
 मन को भटकने की आदत है ।सांसारिक वस्तुओं में वह रमा
रहता है ।शीतलता की ओर वह नहीं जाकर ज्वाला में पतंगे
की तरह जलने में ही उसे आनंद की अनुभूति होती है । पर
वास्तविक आनन्द तो हरि-चरण में ही है । तीनों प्रकार के
तापों से छुटकारा प्रभु के चरणों में ही है ।इसलिए हरि-चरण 
के  पास ही मन रमा रहे , यही मन को समझने की जरूरत
है । भरत प्रभु के चरणों को दिल सा लगाए रखा । प्रभु के
चरण से अहल्या का उद्धार हुआ । देखें प्रभु –चरण की
 महिमा मीरा के इस पद में... मन रे पासि हरि के चरन।
..प्रस्तुति प्रेमकुमार

मन रे पासि हरि के चरन।
सुभग सीतल कमल- कोमल त्रिविध ज्वाला- हरन।
जो चरन प्रह्मलाद परसे इंद्र- पद्वी- हान।।
जिन चरन ध्रुव अटल कींन्हों राखि अपनी सरन।
जिन चरन ब्राह्मांड मेंथ्यों नखसिखौ श्री भरन।।
जिन चरन प्रभु परस लनिहों तरी गौतम धरनि।
जिन चरन धरथो गोबरधन गरब- मधवा- हरन।।
दास मीरा लाल गिरधर आजम तारन तरन।।


11/12/2013








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