शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

तुलसीदास: विनय –पत्रिका :जाके प्रिय न राम बैदेही।… प्रस्तुति प्रेमकुमार

भगवत –भक्ति से जिन्हें कोई लगाव नहीं हो , भगवत –प्रेम में जो बाधा उपस्थित करे , ईश्वर के प्रेम –मार्ग में जो रुकावट डाले , ऐसे व्यक्ति यदि अपना भी कोई हो तो उसका त्याग करना ही श्रेष्कर है । प्रहलाद ने पिता का त्याग किया , विभीषण बंधु से अलग हुए , भरत ने अपनी माता से मुँह मोड़ा, राजा बलि अपने गुरु शुक्राचार्य का त्याग किया  , ब्रज की गोपियाँ ने अपने पतियों का साथ छोड़ा , परन्तु ये सभी सुह्र्द और पूजनीय की श्रेणी में आए ।उस अंजन को आँखों में लगाने का क्या फायदा जिससे आँख ही चली जाय ? यदि अपने प्रियजन रघुनाथ जी के प्रेम से ही वंचित करने लग जायं,तो उन्हें त्याग कर प्रभु –प्रेम में लगना चाहिए ।...देखें यह पद ..श्रीगोस्वामी तुलसीदास जी विरचित . विनय –पत्रिका  से :जाके प्रिय न राम बैदेही। प्रस्तुति प्रेमकुमार

 जाके प्रिय न राम बैदेही ।

तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि    प्रेम   सनेही ।।1।।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बंधु , भरत महतारी ।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनित्नहिं , भए मुद-मंगलकारी।।2।।
नाते नेह रामके मनियत सुह्र्द सुसेब्य जहां       लौं ।
अंजन कहा आंखि जेहि फूटै ,बहुतक कहौं कहाँ     लौं ।।3।
तुलसी सो सब भांति परम हित पूज्य प्रानते प्यारे ।
जासों होय सनेह राम –पद , एतो मतो     हमारॉ ।



06/12/2013


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