भगवत –भक्ति से जिन्हें कोई लगाव नहीं हो , भगवत –प्रेम में जो बाधा उपस्थित करे , ईश्वर के प्रेम –मार्ग में जो रुकावट डाले , ऐसे व्यक्ति यदि अपना भी कोई हो तो उसका त्याग करना ही श्रेयष्कर है । प्रहलाद ने पिता का त्याग किया , विभीषण बंधु से अलग हुए , भरत ने अपनी माता से मुँह मोड़ा, राजा बलि अपने गुरु शुक्राचार्य का त्याग किया , ब्रज की गोपियाँ ने अपने पतियों का साथ छोड़ा , परन्तु ये सभी सुह्र्द और पूजनीय की श्रेणी में आए ।उस अंजन को आँखों में लगाने का क्या फायदा जिससे आँख ही चली जाय ? यदि अपने प्रियजन रघुनाथ जी के प्रेम से ही वंचित करने लग जायं,तो उन्हें त्याग कर प्रभु –प्रेम में लगना चाहिए ।...देखें यह पद ..श्रीगोस्वामी तुलसीदास जी विरचित . विनय –पत्रिका से :जाके प्रिय न राम बैदेही।… प्रस्तुति प्रेमकुमार
जाके प्रिय न राम
बैदेही ।
तजिये ताहि
कोटि बैरी सम, जदपि प्रेम
सनेही ।।1।।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बंधु , भरत महतारी ।
बलि गुरु तज्यो कंत
ब्रज-बनित्नहिं , भए
मुद-मंगलकारी।।2।।
नाते नेह रामके
मनियत सुह्र्द सुसेब्य जहां लौं ।
अंजन कहा आंखि जेहि फूटै
,बहुतक कहौं कहाँ लौं ।।3।
तुलसी सो सब भांति
परम हित पूज्य प्रानते प्यारे ।
जासों होय सनेह राम –पद
, एतो मतो हमारॉ ।
06/12/2013


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