रविवार, 8 दिसंबर 2013

तुलसीदास : गीतावली :भोर भयो जागहु , रघुनंदन !..


बालक राम सो रहें हैं । माँ कौशल्या उन्हे जगाना चाह रही हैं क्योंकि सुबह हो गयी है । कमल खिल गए हैं । कुमुदिनी ने अपना चेहरा छुपा लिया है । चाँद की ज्योति धीमी पड़ गयी है । तारे भी क्षीण हो गए हैं । मुर्गा भी बोलने लगा है ।राम        
के सखा भी खेलने आ गए हैं । ... देखें तुलसीदास का यह पद... : गीतावली  से :भोर भयो जागहु , रघुनंदन!..प्रस्तुति    
प्रेमकुमार

 भोर भयो जागहु ,       रघुनंदन!
गत –व्यलीक भगतनि उर-चन्दन ।।
     ससि करहीन, छिन दुति    तारे ।
     तमचुर मुखर ,सुनहु मेरे   प्यारे ।।
     विकसित कंज ,कुमुद  बिलखाने  ।
     लै पराग  रस मधुप     उड़ाने ।।
     अनुज सखा सब बोलनि   आए ।
     बंदिन्ह अति पुनीत   गुन  गाये ।।
     मन भावतो   कलेऊ     किजै ।
     तुलसिदास कहं    जूंठनि  दीजै ।।

08/  08/12/2013


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