शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

महर्षि संतसेवी परमहंस . करो तुम साधना मन से , सफलता हाथ है तेरे ।



महर्षि संतसेवी परमहंस  जी की एक आध्यात्मिक रचना प्रस्तुत है . करो तुम साधना मन से , सफलता हाथ है तेरे प्रस्तुति प्रेमकुमार

संतमत परंपरा के चतुर्थ आध्यात्मिक गुरु और महर्षि
मेंहीं के प्रथम अनुयायी महर्षि संतसेवी जी का स्थान
संतों की श्रेणी में बहुत श्रेष्ठ कोटी का है ।उनका जन्म
20 दिसंबर1920 को बिहार के एक छोटे –से गांव में
हुआ था । उनकी 94वीं जयंती(2013)के अवसर पर उनकी
एक आध्यात्मिक रचना प्रस्तुत की जा रही है .. करो तुम
साधना मन से , सफलता हाथ है तेरे ...प्रस्तुति प्रेमकुमार

करो तुम साधना मन से , सफलता हाथ है तेरे ।
निश्छल भक्ति कर गुरु की ,हायक साथ है तेरे ।।
न छोड़ो जाप मानस को , न छोड़ो ध्यान मानस को।
अड़ा दो दृष्टि सुखमन में ,तो काला विंदु है नेरे ।।
प्रथम काला दरसता है ,वही फिर श्वेत होता है ।
झलकता ज्योति जगमग है, व मिटता तम का घेरा है।।
दृष्टि जब विंदु पर जमती ,तो अनहद नाद है मिलता ।
नौतें पाँच टपने पर ,नहीं माया का घेरा है ।।
पंचम नौबत अकथ ध्वनि ही ,परम प्रभु से मिलाती है।
संत तहं भाव नहिं द्वैती,  नहीं चौरासी फेरा है ।।

20/12/2013

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

कबीरदास ... झीनी झीनी बीनी चदरिया॥..

कबीरदास ... झीनी झीनी बीनी चदरिया॥...प्रस्तुति प्रेमकुमार


कबीरदास जी की इस आध्यात्मिक एवं निर्गुण रचना में शरीर
और मन की पवत्रिता का संदेश दिया गया है ।मानव शरीर की
रचना इस प्रकार हुई है कि यदि साधक का शरीर पवित्र और
मन निर्मल हो तो उसे परमात्मा कि प्राप्ति अपने अंदर डूबने
से ही हो जाएगी । वाह्य आडंबर में यदि उसका मन भटका है
तो वह परमात्मा से दूर चला जायगा । चादर मैली हो जाएगी
और जीवन निरर्थक हो जाएगा । कितने मुनि और साधक राह
भटक गए । देखें कबीरदास यह पद ... झीनी झीनी बीनी
चदरिया॥...प्रस्तुति प्रेमकुमार
        
झीनी झीनी बीनी चदरिया॥

काहे कै ताना  काहे कै भरनी  कौन तार  से  बीनी  चदरिया।
इंगला पिंगला  ताना भरनी  सुषमन तार से  बीनी  चदरिया॥

आठ कंवल दल चरखा  डोले,  पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया।
साईं को सियत मास दस लागे  ठोक ठोक के बीनी चदरिया॥

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े,  ओढ़ के मैली  कीनी चदरिया।
दास कबीर जतन से ओढ़ी  ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया॥


18/12/2013

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

सूरदास:प्रात समय नवकुंज महल में श्री राधा और नंदकिशोर ॥

कबीरदास ... झीनी झीनी बीनी चदरिया॥...प्रस्तुति प्रेमकुमार


कबीरदास जी की इस आध्यात्मिक एवं निर्गुण रचना में शरीर
और मन की पवत्रिता का संदेश दिया गया है ।मानव शरीर की
रचना इस प्रकार हुई है कि यदि साधक का शरीर पवित्र और
मन निर्मल हो तो उसे परमात्मा कि प्राप्ति अपने अंदर डूबने
से ही हो जाएगी । वाह्य आडंबर में यदि उसका मन भटका है
तो वह परमात्मा से दूर चला जायगा । चादर मैली हो जाएगी
और जीवन निरर्थक हो जाएगा । कितने मुनि और साधक राह
भटक गए । देखें कबीरदास यह पद ... झीनी झीनी बीनी
चदरिया॥...प्रस्तुति प्रेमकुमार
        
झीनी झीनी बीनी चदरिया॥

काहे कै ताना  काहे कै भरनी  कौन तार  से  बीनी  चदरिया।
इंगला पिंगला  ताना भरनी  सुषमन तार से  बीनी  चदरिया॥

आठ कंवल दल चरखा  डोले,  पाँच तत्त गुन तीनी चदरिया।
साईं को सियत मास दस लागे  ठोक ठोक के बीनी चदरिया॥

सो चादर सुर नर मुनि ओढ़े,  ओढ़ के मैली  कीनी चदरिया।
दास कबीर जतन से ओढ़ी  ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया॥


18/12/2013

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

मीरा के पद... या ब्रज में कछु देख्यो री टोना।..


मीरा के पद... या ब्रज में कछु देख्यो री टोना।...प्रस्तुति
प्रेमकुमार


मीरा ब्रज की गोपियों का कृष्ण –प्रेम दरसा रही हैं ।
लगता है कि किसी ने उनके ऊपर टोना कर दिया है ।
दही बेचने घर से निकलती हैं । किन्तु आगे जाने पर
जब राह में श्याम मिल मिल जाते हैं ,तो सुध-बुध खो
बैठती है ...ही की जगह श्याम –सलोना ही ग्राहक को
बेचने लगती है ...मनमोहन के प्रेम में पूरी तरह खो गयी
है ...देखें यह पद या ब्रज में कछु देख्यो री टोना।...प्रस्तुति
प्रेमकुमार

या ब्रज में कछु देख्यो री टोना।
लै मटुकी सिर चली गुजरिया, 
आगे मिले बाबा नंदजी के छोना।
दधि को नाम बिसरि गयो प्यारी, 
लैलेहु री कोई स्याम सलोना।
वृंदावन की कुंज गलिन में, 
नेह लगाइ गयो मनमोहना।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर, 
सुंदर स्याम सुघर रस लोना। 
 


16/12/2013

रविवार, 15 दिसंबर 2013

सूरदास के पद ...स्याम कमल पद नख की सोभा । ..

सूरदास के पद ..स्याम कमल पद नख की सोभा ।       ...प्रस्तुति प्रेमकुमार

सखी कहती है – श्याम के कमल रूपी चरण के नख की शोभा का वर्णन नहीं किया जा सकता है । श्याम के उन नख –चंद्रों को जिन्हें इन्द्र ने अपने मस्तक से लगाया ;ब्रह्मा और शिव जिन नख –चंद्रों पर मग्न रहे मुनि जिनका ध्यान असमंजस होकर करते हैं कि दर्शन का सौभाग्य मिले या न मिले ; नारद जिन्हें एक क्षण के लिए भी नहीं भुला पाये और लक्ष्मी जी का हृदय जिनको स्पर्श रता रहता  है, परंतु बृज  की गोपियाँ ही ऐसी हैं जो प्रत्यक्ष उनकी शोभा देख कर हर्षित होती हैं ,,,देखें सूरदास  जी का यह पद ...स्याम कमल पद नख की सोभा ।  ...प्रस्तुति प्रेमकुमार
  
स्याम कमल पद नख की सोभा ।
जे नख चं इन्द्र सिर परसे,सिव बिरंचि मन लोभा ।
जे नख चंसनक मुनि ध्यावत नहीं पावत भरमाहीं ।।
जे नख चंप्रगब्रज जुबती निरखि निरखि हरषाहीं ।
जे नख चंफनिंद ह्रदय तें एकौ निमिष न टारत ।
जे नख चं महामुनि नारद  पलक न कहू बिसारत।।
जे नख चंभजन खल नासत, रमा ह्रदय जे परसति ।
सूर स्याम नख चंद बिमल छबि गोपी जन मिलि दरसति।।
16/12/2013










सूरदास के पद...देखि री, हरि के चंचल नैन

सूरदास के पद...देखि री, हरि के चंचल नैन ...प्रस्तुति प्रेमकुमार

गोपी अपनी सखी से श्री कृष्ण के नयन का वर्णन कर रही है ।वह कहती है कि कृष्ण के नयन कि चंचलता की तुलना खंजन,मीन (मछ्ली)तथा मृग के छौने से भी
नहीं की जा सकती । यदि सभी प्रकार के कमलों में भी उनके नयन की सुंदरता ढूँढी जाय तो वह प्रयास भी निरर्थक होगा क्यों कि रात में तो कमल बंद पड़े रहते हैं और सुबह होने पर ही खिलते हैं , परंतु हरि के नेत्र –कमल तो रात –दिन खिले रहते हैं ।कृष्ण जब पलक
उठाते हैं , उनकी आँखों के काले ,स्वेत और नीला रंग
ऐसा दीखता है जैसे गंगा ,यमुना और सरस्वती ने वहाँ
अपना वास कर लिया हो । उनकी भंगिमा तो ऐसी है कि जैसे प्रबल जल -धारा को देखने पर मन स्थिर नहीं रहता है , वही अवस्था हो जाती है ।सूरदास जी कहते है कि स्याम के नेत्रों की शोभा अपार है , उसके लिए जिन उपमाओं का प्रयोग किया जाय , स्वयं उपमाएँ
लज्जित हो जाती हैं अर्थात उपमाएँ सब फीकीं पड़
जाति हैं । देखें यह पद ... ...देखि री, हरि के चंचल नैन ...प्रस्तुति प्रेमकुमार ...

देखि री, हरि के चंचल नैन ।
खंजन मीन मृगज चपलाई नहीं पटतर इक सैन।।
राजिव दल , इंदीवर सतदल कमल, कुसेसय जाति।
निसि मुद्रित,प्रातहिं बिकसित , ए बिकसित दिन रात ।।
अरुन, सेत, सित झलक पलक प्रति को बरनै उपमाइ ।
मनु सरसुति , गंगा ,यमुना मिलि आस्त्रम कीन्हौ आइ।।
अवलोकनि जलधार तेज अति , तहाँ न मन  ठैराइ ।

सूर स्याम लोचन अपार छबि  उपमा सुनि सरमाइ ।।

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

सूरदास के पद...बसौ मेरे नैननि में यह जोरी ।



सूरदास के पद...सौ मेरे नैननि में यह जोरी । ...प्रस्तुति प्रेमकुमार

सूरदास जी की कामना है कि राधा और श्याम कि जोरी
उनके नयन में बस जाय।कृष्ण के कमल सदृश्य  आँखें ,
मस्तक पर मयूरपिच्छ का मुकुट, कानों में मकराकृत
कुंडल और शरीर पर पीतांबर लहरा रहा है ।
सूरदास जी अपनी अल्प बुद्धि से कृष्ण के इतने
मोहक रूप का वर्णन करने में असमर्थ हैं ।

 सौ मेरे नैननि में यह जोरी ।
सुंदर स्याम कमल दल लोचन,
संग बृषभानु        किसोरी।।
मोर मुकुट , मकराकृत कुंडल ,
पीताम्बर          झकझोरी ।
सूरदास  प्रभु तुम्हरे दरस कौ ,
का बरनों       मति  थोरी ।।




13/12/2013 

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

मीरा के पद... मन रे पासि हरि के चरन।..


मीरा के पद... मन रे पासि हरि के चरन।... प्रस्तुति प्रेमकुमार
 मन को भटकने की आदत है ।सांसारिक वस्तुओं में वह रमा
रहता है ।शीतलता की ओर वह नहीं जाकर ज्वाला में पतंगे
की तरह जलने में ही उसे आनंद की अनुभूति होती है । पर
वास्तविक आनन्द तो हरि-चरण में ही है । तीनों प्रकार के
तापों से छुटकारा प्रभु के चरणों में ही है ।इसलिए हरि-चरण 
के  पास ही मन रमा रहे , यही मन को समझने की जरूरत
है । भरत प्रभु के चरणों को दिल सा लगाए रखा । प्रभु के
चरण से अहल्या का उद्धार हुआ । देखें प्रभु –चरण की
 महिमा मीरा के इस पद में... मन रे पासि हरि के चरन।
..प्रस्तुति प्रेमकुमार

मन रे पासि हरि के चरन।
सुभग सीतल कमल- कोमल त्रिविध ज्वाला- हरन।
जो चरन प्रह्मलाद परसे इंद्र- पद्वी- हान।।
जिन चरन ध्रुव अटल कींन्हों राखि अपनी सरन।
जिन चरन ब्राह्मांड मेंथ्यों नखसिखौ श्री भरन।।
जिन चरन प्रभु परस लनिहों तरी गौतम धरनि।
जिन चरन धरथो गोबरधन गरब- मधवा- हरन।।
दास मीरा लाल गिरधर आजम तारन तरन।।


11/12/2013








गुरु नानक की वाणी... जगत में झूठी देखी प्रीत।..

जिस संसार के मोह –माया में हम घिरे रहते हैं ,जिसे हम वास्तविक प्रेम समझ बैठे हैं, वह छलावा –मात्र है । सभी अपने-अपने सुखों में लगे हैं।अंत समय में नाते –रिश्ते किसी काम में नहीं आते हैं ।सच्चा प्रेम कहीं नहीं है ।पर यह बात मन मानने को तैयार नहीं होता है ।यदि मन को इस बात का बोध हो जाय, तो प्रभु-मिलन का मार्ग सुगम हो जाता है...देखें गुरु नानक जी का यह पद ...जगत में झूठी देखी प्रीत. प्रस्तुति प्रेमकुमार


जगत में झूठी देखी प्रीत।
अपने ही सुखसों सब लागे , क्या दारा क्या मीत ।।
मेरो मेरो सभी क़हत हैं ,   हित सों   बाध्यौ चीत ।
अंतकाल संगी नहीं काऊ,    यह अचरज  ली बात ।।
मन मूरख अजहूँ नहिं समुझत , सिख दै हारयो नीत ।
नानक भव-जल-पार परै जो गावै प्रभु के     गीत ।।

11/12/2013
pkjayaswal11@gmail.com


तुलसीदास : गीतावली : बैठी सगुन मनावति माता।…











कौशल्या बैठी शकुन मनाती है । काग से पूछती है –तुम सच बोलो और मुझे बताओ की मेरे प्राणों से प्यारे वे लोग कब आएंगे ?काग को लालच भी देती है कि उसे दोने में दूध पीने को देगी और उसके चोंच को सोने से मढ़वा देगी ।फिर उसे यह भान होने लगता है कि राम-वन –गमन की अवधि अब समाप्त होने को है इसलिए वह ज्योतिष भी बुलवा लेती है कि वह जान ले कि वह कौन –सी घड़ी होगी जब उसके नयन जुड़ा जाएंगे । तभी उसे उनके लौटने कि सूचना मिलती है ।


इस सूचना से कौशल्या  की वही दशा होती है जैसे जल-विहीन मीन को पुन: जल मिल गया हो ...प्राण पुन: जीवित हो गया हो ।... तुलसीदास की  गीतावली : बैठी सगुन मनावति माता।
बैठी सगुन मनावति माता।
कब ऐहैं मेरे बाल कुशल घर ,कहहु ,काग !फुरी बाता ।।
दूध भात की दोनों दैहों , सोने चोंच      मढ़ैहौं  ।
जब सिय- सहित बिलोकि नयन भरि राम –लषण उर लैहौं।।
अवधि समीप जानि जननी जिय    अति आतुर अकुलानी ।
गनक बोलाइ, पांय परि पुछति प्रेम मगन    मृदु  बानी ।।
तेहि अवसर कोउ भरत निकटते समाचार   लै      आयो ।
प्रभु –आगमन सुनत तुलसि मनो मीन  मरत जल पायो ।।




10/12/2013

रविवार, 8 दिसंबर 2013

तुलसीदास : गीतावली :भोर भयो जागहु , रघुनंदन !..


बालक राम सो रहें हैं । माँ कौशल्या उन्हे जगाना चाह रही हैं क्योंकि सुबह हो गयी है । कमल खिल गए हैं । कुमुदिनी ने अपना चेहरा छुपा लिया है । चाँद की ज्योति धीमी पड़ गयी है । तारे भी क्षीण हो गए हैं । मुर्गा भी बोलने लगा है ।राम        
के सखा भी खेलने आ गए हैं । ... देखें तुलसीदास का यह पद... : गीतावली  से :भोर भयो जागहु , रघुनंदन!..प्रस्तुति    
प्रेमकुमार

 भोर भयो जागहु ,       रघुनंदन!
गत –व्यलीक भगतनि उर-चन्दन ।।
     ससि करहीन, छिन दुति    तारे ।
     तमचुर मुखर ,सुनहु मेरे   प्यारे ।।
     विकसित कंज ,कुमुद  बिलखाने  ।
     लै पराग  रस मधुप     उड़ाने ।।
     अनुज सखा सब बोलनि   आए ।
     बंदिन्ह अति पुनीत   गुन  गाये ।।
     मन भावतो   कलेऊ     किजै ।
     तुलसिदास कहं    जूंठनि  दीजै ।।

08/  08/12/2013


शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

तुलसीदास: विनय –पत्रिका :जाके प्रिय न राम बैदेही।… प्रस्तुति प्रेमकुमार

भगवत –भक्ति से जिन्हें कोई लगाव नहीं हो , भगवत –प्रेम में जो बाधा उपस्थित करे , ईश्वर के प्रेम –मार्ग में जो रुकावट डाले , ऐसे व्यक्ति यदि अपना भी कोई हो तो उसका त्याग करना ही श्रेष्कर है । प्रहलाद ने पिता का त्याग किया , विभीषण बंधु से अलग हुए , भरत ने अपनी माता से मुँह मोड़ा, राजा बलि अपने गुरु शुक्राचार्य का त्याग किया  , ब्रज की गोपियाँ ने अपने पतियों का साथ छोड़ा , परन्तु ये सभी सुह्र्द और पूजनीय की श्रेणी में आए ।उस अंजन को आँखों में लगाने का क्या फायदा जिससे आँख ही चली जाय ? यदि अपने प्रियजन रघुनाथ जी के प्रेम से ही वंचित करने लग जायं,तो उन्हें त्याग कर प्रभु –प्रेम में लगना चाहिए ।...देखें यह पद ..श्रीगोस्वामी तुलसीदास जी विरचित . विनय –पत्रिका  से :जाके प्रिय न राम बैदेही। प्रस्तुति प्रेमकुमार

 जाके प्रिय न राम बैदेही ।

तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जदपि    प्रेम   सनेही ।।1।।
तज्यो पिता प्रहलाद, विभीषण बंधु , भरत महतारी ।
बलि गुरु तज्यो कंत ब्रज-बनित्नहिं , भए मुद-मंगलकारी।।2।।
नाते नेह रामके मनियत सुह्र्द सुसेब्य जहां       लौं ।
अंजन कहा आंखि जेहि फूटै ,बहुतक कहौं कहाँ     लौं ।।3।
तुलसी सो सब भांति परम हित पूज्य प्रानते प्यारे ।
जासों होय सनेह राम –पद , एतो मतो     हमारॉ ।



06/12/2013


बुधवार, 4 दिसंबर 2013

महर्षि मेंहीं-पदावली :(4-अंतिम) : सभी के परे जो परम तत्त्व रूपी ...सोई आत्मा है सोई आत्मा है...प्रस्तुति प्रेमकुमार

महर्षि मेंहीं-पदावली  :(4-अंतिम) 

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को आत्मा के संबंध में जो उपदेश दिए , आत्मा को जानने-समझने के लिए महर्षि मेंहीं
ने इस पदावली में इस गूढ़ विषय को किस प्रकार हमारे समक्ष रखा है ... देखें पदावली के अंतिम अंश... प्रस्तुति प्रेमकुमार ...

 (4-अंतिम)

भरो व्योम से घट फिरै व्योम में    जस।
भरो सव तासों फिरै     ताहि में  तस।।
नहीं  आदि  अवसान नहिं मध्य  जाको ।
नहीं  ठौर कोऊ  रखै  पूर्ण      वाको ।।
सभी के  परे       जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है          सोई आत्मा है।।

हैं घट मठ  पटाकाश   कहते  बहुत-सा ।
टूटे रहै    एक  तो        अकाशा।।
है तस ही अमित चर अचर हू को आतम ।
हैं बहु न टूटै न होवै सो बहु     कम।।
सभी के  परे       जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है          सोई आत्मा है।।
न था काल जब      था वरतमान जोई ।
नहीं काल ऐसो       रहेगा  न    ओई ।।
मिटैगा अवस काल    वह   न  मिटैगा ।
है सतगुरु जो पाया    वही  यह बुझेगा ।।
सभी के  परे       जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है          सोई आत्मा है।।

सरव श्रेष्ठ तनधर की भी बुधि   न गहती ।
जो ऐसो   अगम संतवाणी   ये   कहती ।।
करै पूरा वर्णन तिसे  मेंहिं       कैसे ।
है कंकर –वणिक  कहै मणि-गुण को जैसे ।।
सभी के  परे        जो परम तत्त्व रूपी ।
सोई आत्मा है           सोई आत्मा है।।




05/12/2013