मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

विद्यापति :(शिव को वर के रूप में): जोगिया एक हम देखल गे माई


जोगिया एक हम देखल गे माई

शिव को वर के रूप में देख कर एक बाला अपनी प्रतिक्रिया
माँ से जाहिर करती है ...देखें मैथिली के कवि विद्यापति के
शब्दों में... प्रस्तुति प्रेमकुमार

जोगिया एक हम देखल गे माई ।
अढ्भुत रूप,कहल नहिं जाई ।
पाँच वादन,तीन नयन विशाला ।
वसन विहून ओढ़न बघछाला ।
सिर वह गंग,तिलक सोहू चंदा ।
देखि सरूप  मेटल  दुख –दन्दा ।
एही जोगियामे रतली भवानी ।
मन आनल पर कौन गुन जानी ।
कुल नहीं सिल, नहिं तात महतारी।
वएस हिनक थिक लक्ष जुग चारी ।
सुनु ए मनाइनि विद्यापति वाणी ।

एहो जोगीआ थिका त्रिभुवन दानी ।
pkjayaswal11@gmail.com

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