मेरे भक्ति-साहित्य
के संकलन से... प्रेमकुमार
भक्ति-–साहित्य के अनमोल
धरोहर से कुछ मोती पाठकों के समक्ष पेश करने की उत्कट अभिलाषा से प्रेरित है
-यह प्रयास...
शिव को वर के रूप
में देख कर माता की कैसी तीव्र प्रतिक्रिया
होती है ...ज्वालामुखी की भांति माँ का क्रोध किस प्रकार
फूट पड़ता है
...देखें मैथिली के कवि विद्यापति के शब्दों में... प्रस्तुति प्रेमकुमार
हम नहिं आजु रहब एहि
आँगन ,
जओं बुढ़
होएत जमाए ।
एक तं बैरी भेल बिधी
बिधाता ,
दोसर धिया केर
बाप ।
तेसर बैरी भेल नारद
बाभन,
जे बुढ़
आनल जमाए ।
पहिलुक बाजन डमरू
तोरब ,
दोसरे तोड़ब
रुण्डमाल ।
बड़द हाँकि बरिआत बैलाएब ,
धिया लए जाएब पड़ाए ।
धोती लोटा पतड़ा पोथी
,
सेहो सब लेबिन्ह
छिनाए ।
जों कुछ बजता नारद
बाभन,
दाढ़ी धए घिसिआयब
।
भनहि विद्यापति सुनु
हे मनाइनि,
दिढ़ करू अपन गेआन ।
सुभ सुभ कए धिआ बिआहिब,
गौरी-हर एक समान ।
(pkjayaswal@gmail.com)

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