हरि सौं मीत न देख्यो कोई ।
बिपति-काल सुमिरत ,तिहिं औसर आनि तिरीछो होई ।।
ग्राह गहे
गजपति मुकरायौ , हाथ चक्र लै धायो ।
तजि बैकुंठ, गरुड़ तजि , निकट दास कै आयो ।।
दुर्बासा कौ साप निवारयौ ,अंबरीष-पति राखी ।
ब्रह्मलोक –परजंत फिरयौ तहं देव –मुनि-जन साखी।।
लाखागृह तै जरत पांडु-सुत बुधि-बल
नाथ उबारे ।
सूरदास-प्रभु
अपने जनके नाना त्रास निवारे ।।
pkjayaswal11@gmail.com 24/11/2013





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