सोमवार, 25 नवंबर 2013

तुलसीदास : राजन ! राम –लखन जो दीजै। [Tulsidas: Ram-Lakhan jo dijai ]



तुलसीदास : राजन ! राम –लखन जो दीजै।
[Tulsidas: Ram-Lakhan jo dijai ]

राजा दरथ के पास मुनि विश्वामित्र पधारे हैं । राजा से मुनि
दोनों पुत्रों को ले जाने की मांग कर रहें हैं । आश्रम के आस-पास दानवों का उपद्रव बढ़ता जा रहा है जो मुनियों की तपस्या में विघ्न दल रहे हैं । मुनि जानते हैं कि दानवों का नाश राम और लक्ष्मण द्वारा ही होगा । पर राजा भयभीत हैं कि मेरे ये प्राणों से अधिक प्यारे सुकुमार बालक दानवों से मुनि कि रक्षा भला किस प्रकार करेंगे ? विश्वामित्र जी उन्हें
समझाते हैं कि आप अपने पुत्रों के विषय में वामदेव और अपने कुल-गुरु वशिष्ठ जी से पूछिये ! आप स्वयं भी बड़े कुशल हैं । इनको साथ ले जाने में इनका भी लाभ है ...
रघुवंश की कीर्ति इनसे ही उजागर होगी ...मुनियों की
तपस्या भी सफल होगी ...देखें तुलसीदास जी का यह पद तुलसीदास : राजन ! राम –लखन जो दीजै। ...प्रस्तुति प्रेमकुमार

राजन ! राम –लखन जो दीजै।
जस रावरो , लाभ ढोटनिहूँ ,
मुनि   सनाथ   सब कीजै  ।
डरपत हौ साँचे सनेह   बस ,
सुत-प्रभाव      बिनु   जाने ।
बूझिय बामदेव अरु   कुलगुरु,
तुम पुनि       परम सयाने।।

रिपु रन दलि,  मख     राखि,
कुसल अति अलप दिननि घर ऐहैं।
तुलसिदास       रघुबंसतिलककी
कबिकुल          कीरति    गैहैं ।।

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