रविवार, 24 नवंबर 2013

सूरदास : होत सो, जो रघुनाथ ठटै .. [Surdas : hot so ,jo Raghunath thtai …]

सूरदास : होत सो, जो रघुनाथ ठटै ...प्रस्तुति प्रेमकुमार

  [Surdas : hot so ,jo Raghunath thtai …]

रघुनाथ जी ने जो विधान रच दिया है , जीवन की घटनाएँ उसी के अनुरूप घटेगीं । ध्यान , योग , साधना ,तप यदि विधान को बदलने के उद्देश्य से किया जाय तो सार्थक साबित नहीं होगा । वेद –पुराण का पाठ यदि होनी को टालने के नियत से किया जाय तो वह भी कारगर नहीं होगा । कर्म –बंधन भगवत-भजन जैसे अस्त्र से कट सकता है । ...देखें सूरदास जी का यह पद ... होत सो, जो रघुनाथ ठटै ...प्रस्तुति प्रेमकुमार


होत सो, जो रघुनाथ ठटै ।
पचि-पचि रहैं सिद्ध ,साधक ,मुनि,
तऊ      न          बढै-टै।।
जोगी जोग धरत मन अपनै ,
सिर पर     राखि    जटै ।
ध्यान धरत महादेव अरु ब्रह्मा,
तिनहुं      पै      न  छटै ।।
जती, सती , तापस आराधै ,
चारों वेद              रटै ।
सूरदास भगवंत –भजन बिनु,
काम-फांस        न  कटै ।।









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