सूरदास : होत सो, जो रघुनाथ ठटै ...प्रस्तुति प्रेमकुमार
[Surdas : hot so ,jo
Raghunath thtai …]
रघुनाथ जी ने जो विधान
रच दिया है , जीवन की घटनाएँ उसी
के अनुरूप घटेगीं । ध्यान , योग , साधना ,तप यदि विधान को बदलने के उद्देश्य
से किया जाय तो सार्थक साबित नहीं होगा । वेद –पुराण का पाठ यदि होनी को टालने के नियत
से किया जाय तो वह भी कारगर नहीं होगा । कर्म –बंधन भगवत-भजन जैसे अस्त्र से कट सकता
है । ...देखें सूरदास जी का यह पद ... होत सो, जो रघुनाथ ठटै ...प्रस्तुति प्रेमकुमार
होत सो, जो रघुनाथ ठटै ।
पचि-पचि रहैं सिद्ध ,साधक ,मुनि,
तऊ न बढै-घटै।।
जोगी जोग धरत मन अपनै
,
सिर पर राखि
जटै ।
ध्यान धरत महादेव अरु
ब्रह्मा,
तिनहुं पै न छटै
।।
जती, सती , तापस आराधै ,
चारों वेद रटै ।
सूरदास भगवंत –भजन बिनु,
काम-फांस न कटै ।।
pkjayaswal11@gmail.com 25/11/2013
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