गुरुवार, 16 अक्टूबर 2014

श्री राम स्तुति



श्री राम स्तुति



श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम्।

नवकंज लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद-कंजारुणम्॥

.
कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनील-नीरद सुन्दरम्।

पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरम्॥

.

.
भजु दीनबंधु दिनेश दानव, दैत्य-वंश-निकन्दनम्।

रघुनंद आनंदकंद कौशलचंद दशरथ-नंदनम्॥

.

सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणम्।

आजानुभुज शर चाप धर, संग्रामजित खरदूषणम्॥

.
.

इति वदति तुलसीदास शंकर, शेष-मुनि-मन-रंजनम्।

मम हृदय-कंज-निवास कुरु, कामादि खल दल गंजनम्॥

.

मनु जाहिं राचेहु मिलिहि सो बरु सहज सुंदर सांवरो।

करुणा निधान सुजान सील सनेह जानत रावरो॥

.
.
.
एहि भांति गौरि असीस सुनि सिय सहित हिय हरषी अली।

तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥

.

सोरठा: जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।

मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥

॥ सियावर रामचन्द्र की जय ॥
.

.
.

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें