रविवार, 18 मई 2014

सरस्वती –वंदना : महाकवि निराला

                                         

                                           सरस्वती –वंदना :

 वर दे, वीणावादिनि वर दे !  निराला: वर दे, वीणावादिनि वर दे !
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
        भारत में भर दे !

काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि
, ज्योतिर्मय निर्झर;
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
        जगमग जग कर दे !

नव गति
, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ
, नव जलद-मन्द्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
        नव पर, नव स्वर दे !

वर दे
, वीणावादिनि वर दे।

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